
नलाटेश्वरी मंदिर
नलहाटी,
बीरभूम ज़िले के पाँच पवित्र
स्थलों में से एक
है, जहाँ भगवान विष्णु
के सुदर्शन चक्र से कटकर
माता सती के शरीर
का एक अंग गिरा
था। नलहाटी, साहेबगंज लूप लाइन का
एक प्रमुख नगर है, जो
बीरभूम ज़िले की सीमा पर
स्थित है। यह तारापीठ
से लगभग 25 किलोमीटर की दूरी पर
स्थित है।
बीरभूम
के नलहाटी क्षेत्र का इतिहास अत्यंत
प्राचीन है। यह लगभग
हजारों वर्ष पुराना है और इसका
उल्लेख तब से मिलता
है जब यह क्षेत्र
"बजभूमि"
और "राढ़" नाम से जाना
जाता था। ईसा पूर्व पाँचवीं शताब्दी में यहाँ महावीर
जैन का प्रभाव था।
यह क्षेत्र उस समय घने
जंगलों और दुर्गम पहाड़ियों
से आच्छादित था। उस काल
में मौर्य सम्राटों ने इस क्षेत्र
को "राढ़भूमि" के रूप में
शासित किया था। बाद
में, हर्षवर्धन, शशांक, गुप्त, पाल एवं सेन वंश के शासकों ने
इस क्षेत्र पर शासन किया।
नलहाटी:
५१ शक्तिपीठों में से एक पवित्र स्थल
यह स्थान 51 शक्तिपीठों में से एक
है। ऐसा माना जाता
है कि यहां माता
सती का गला या "नला" गिरा था। कुछ
कथाओं के अनुसार, माता
सती का ललाट (कपाल) यहाँ गिरा था।
भारत में कुल 51 शक्तिपीठ
हैं, जिनमें पश्चिम बंगाल के तीन प्रमुख शक्तिपीठ— कालीघाट, कामाख्या और नलाटेश्वरी माने जाते हैं।
पौराणिक
कथा
पौराणिक
मान्यताओं के अनुसार, माता
सती के पिता राजा
दक्ष ने जब भगवान
शिव को अपने यज्ञ
में आमंत्रित नहीं किया और
उनका अपमान किया, तो माता सती
ने यज्ञ अग्नि में
कूदकर आत्मदाह कर लिया। यह
देख भगवान शिव क्रोधित हो
गए और उन्होंने माता
सती के पार्थिव शरीर
को लेकर तांडव करना
शुरू कर दिया। इस
उग्र रूप को देखकर
सृष्टि के संतुलन को
बनाए रखने के लिए
भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन
चक्र से माता सती
के शरीर को कई
टुकड़ों में विभाजित कर
दिया। माता सती के
शरीर के जो अंग
जहाँ-जहाँ गिरे, वे
स्थान शक्तिपीठ के रूप में
पूजित हुए।
शक्ति
एवं भैरव
यह मंदिर 51 शक्तिपीठों में से एक
विशेष शक्तिपीठ के रूप में
प्रसिद्ध है। धार्मिक ग्रंथों
में इसका उल्लेख इस
प्रकार मिलता है—
"नलाहाट्यां
नलापातो योगीशो भैरवस्तथा।
तत्र सा कालिका देवी सर्वसिद्धि प्रदायिका।"
अर्थात्
नलहाटी में माता सती का "नला" गिरा था। यहाँ देवी को "कालिका" के रूप में पूजा जाता है और उनके भैरव का नाम "योगीश" है।
स्थानीय
मान्यताओं के अनुसार, बंगाली
पंचांग के 252वें वर्ष में, "बंगपट्ट" के दौरान, प्रेम
और आकर्षण के देवता कामदेव
को एक स्वप्न आया
था, जिसमें उन्होंने इस नलहाटी जंगल
में माँ सती के स्वरयंत्र (कंठ) के अस्तित्व
को देखा। उसी स्वप्न के
माध्यम से, उन्होंने इस
पवित्र स्थान की खोज की।
एक अन्य लोककथा के
अनुसार, राम शरण देव शर्मा नामक एक व्यापारी
और साधक को स्वप्न
में माँ नलाटेश्वरी के
दर्शन हुए, जिसके बाद
उन्होंने यहाँ पूजा-अर्चना
प्रारंभ की।
इतिहास
में उल्लेख मिलता है कि नटोर
की रानी भवानी ने इस मंदिर
को विशेष महत्व दिया और इसके
लिए भूमि दान की।
इसके बाद, नशिपुर के राजा देवी सिंह ने इस मंदिर
की पूजा और अन्य
धार्मिक अनुष्ठानों के लिए आर्थिक
सहायता की व्यवस्था की।
तांत्रिक
साधना और आध्यात्मिक मान्यता
एक अन्य लोककथा के
अनुसार, ब्रह्मचारी कुशलानंद पहले व्यक्ति थे
जिन्होंने माँ को "भोग" अर्पित
किया और पंच-मुंड-आसन पर बैठकर तंत्र
साधना की।
माँ
नलाटेश्वरी को "भाग्यविधाता-नलाटेश्वरी" के रूप में
भी जाना जाता है।
वे देवी पार्वती और
कालिका के रूप में
पूजित होती हैं, और
उनके भैरव का नाम
"योगीश"
है।
मंदिर
की स्थापत्य शैली और विशेषताएँ
मंदिर
का स्थापत्य शैली अत्यंत प्राचीन
है और यह उत्कृष्ट
बंगाली कला एवं परंपरा
को दर्शाता है। मंदिर के
गर्भगृह में माँ नलाटेश्वरी प्रतिष्ठित हैं। उनकी पत्थर
की बनी प्रतिमा लगभग
4 फीट ऊँची है।
माँ
नलाटेश्वरी की मूर्ति की
विशेषताएँ:
गर्भगृह
के प्रवेश द्वार पर गणेश जी विराजमान हैं, और उनके चारों
ओर आठ नागों की मूर्तियाँ हैं।
पवित्र
पंचमुण्डी आसन और अन्य रहस्यमय स्थल
प्राकृतिक
सौंदर्य और आध्यात्मिकता
नलहाटी
एक अत्यंत सुंदर, पवित्र और रहस्यमय स्थान है। यहाँ चारों
ओर पहाड़, जंगल और प्राकृतिक सुंदरता फैली हुई है।
यह स्थल प्राकृतिक सौंदर्य, इतिहास और धर्म का अद्भुत संगम
है।
ऐसा
माना जाता है कि
एक प्राचीन वटवृक्ष (बड़ का पेड़), जो एक गहरी
गुफा के समीप स्थित
है, उसी स्थान पर
है, जहाँ माँ सती का "नला" (गला) गिरा था।
भैरव
योगेश और विष्णु पदचिन्ह
भैरव
योगेश के मंदिर में
एक प्राचीन पदचिन्ह पाया गया है,
जिसे भगवान विष्णु का पदचिन्ह माना जाता है।
हालांकि, इसकी सटीक ऐतिहासिक प्रमाणिकता अज्ञात है, लेकिन इसे
एक दैवीय आशीर्वाद के रूप में
पूजा जाता है।
मिथक
और किंवदंतियाँ
नलहाटी:
श्रद्धा और आस्था का केंद्र
इस स्थान की पवित्रता, आध्यात्मिक
शक्ति और प्राकृतिक सौंदर्य
सभी को आकर्षित करते
हैं। यहाँ आने वाले
श्रद्धालु न केवल आध्यात्मिक
शांति पाते हैं, बल्कि
मंदिर का अलौकिक वातावरण
उन्हें गहन भक्ति और शांति का अनुभव कराता है।
বীরভূমের নলহাটি অঞ্চলটির ইতিহাস বহু প্রাচীন। এটি প্রায় হাজার বছরের পুরানো এবং এর সূত্রপাত তখন থেকেই যখন অঞ্চলটি "বজভূমি" ও
"রাঢ়" নামে
পরিচিত ছিল। খ্রিস্টপূর্ব পঞ্চম শতকে মহাবীরের প্রভাব এই অঞ্চলে ছিল। এটি তখন ছিল দুর্গম এবং বন্য এলাকা। মৌর্য সম্রাট "রাঢ়ভূমি" শাসন করতেন। পরবর্তী সময়ে হর্ষবর্ধন, শশাঙ্ক, গুপ্ত এবং পরে পাল ও সেন রাজারা এই অঞ্চল শাসন করেছিলেন।
নলহাটি একটি পবিত্র স্থান, যা ৫১টি শক্তিপীঠের একটি। এই স্থানে সতীর গলা বা "নলা"
পড়েছিল বলে কথিত। কেউ কেউ বলেন, সতীর ললাট বা কপাল এখানে পড়েছিল। ভারতে ৫১টি শক্তিপীঠ রয়েছে এবং এর মধ্যে পশ্চিমবঙ্গের তিনটি বিখ্যাত পীঠ হল কালীঘাট, কামাখ্যা এবং নলতেশ্বরী।
পৌরাণিক কাহিনী অনুসারে, সতীর পিতা দক্ষ শিবকে যজ্ঞে আমন্ত্রণ না জানানোয় অপমানিত হয়ে সতী যজ্ঞের আগুনে আত্মাহুতি দেন। শিব এই ঘটনায় ক্রুদ্ধ হয়ে উঠলে, বিষ্ণু তাঁর চক্র দিয়ে সতীর দেহ খণ্ডিত করেন। সতীর দেহের অংশ বিভিন্ন স্থানে পড়ে, যা পরে শক্তিপীঠে রূপান্তরিত হয়।
এই
মন্দির একান্ন পীঠের একটি পীঠ হিসাবে চিহ্নিত। পীঠ নির্ণয়ের বর্ণনায় চতুশ্চত্বারিংশৎ
শক্তিপীঠ হল নলহাটী। সেখানে বর্ণিত রয়েছে-
“নলাহাট্যাং
নলাপাতো যোগীশো ভৈরবস্তথা।
তত্র
সা কালিকা দেবী সর্বসিদ্ধি প্রদায়িকা।”
অর্থাৎ
নলহাটীতে পড়েছে সতীর নলা। দেবীর নাম এখানে- কালী। ভৈরবের নাম- যোগীশ।
স্থানীয়দের মতে, 252 তম বাংলা বর্ষে বা " বঙ্গপটো “, " কামদেব"
(প্রেমের বা আকাঙ্ক্ষার দেবতা) যিনি এর অস্তিত্বের স্বপ্ন দেখেছিলেন তিনি এই নলাহাটি জঙ্গলে মা সতীর স্বরযন্ত্র আবিষ্কার করেছিলেন। অন্য একটি মৌখিক কিংবদন্তি বর্ণনা থেকে জানা যায় যে
রাম শরম দেবশর্মা নামে জনৈক
ব্যবসায়ী তথা সাধক স্বপ্নাদেশ
পেয়ে
মা নলাটেশ্বরীর পূজা শুরু করেছিলেন।
নটোরের রানি ভবানীও মন্দিরটিকে
বিশেষ গুরুত্ব দিয়ে জমি দান করেছিলেন।
পরে নশিপুরের রাজা দেবী সিংহ
মন্দিরের পূজা ও অন্যান্য
আয়োজনের জন্য আর্থিক সাহায্যের
ব্যবস্থা করেন।
অন্য একটি মৌখিক কিংবদন্তি
বর্ণনা থেকে জানা যায় যে ,পরবর্তী সময়ে, ব্রহ্মচারী কুশলানন্দ প্রথম "ভোগ" প্রদান করেছিলেন এবং "পঞ্চ-মুণ্ড-আসন"
এ তন্ত্র সাধনা করেছিলেন।
এই স্থানের দেবী মা নলাটেশ্বরী,
যিনি "ভাগ্যবিধাতা-নলাটেশ্বরী", দেবী পার্বতী বা
কালিকা নামেও পরিচিত , এবং এখানকার ভৈরব 'যোগীশ' নামে পরিচিত।
মন্দিরের স্থাপত্যশৈলী বহু প্রাচীন এবং
মন্দিরে গঠনশৈলী উৎকৃষ্ট বাঙালি ঐতিহ্যের উপস্থিতিকে সূচিত করে। মন্দিরে গর্ভগৃহে
মা নলাটেশ্বরী বিরাজমান। পাথরে তৈরি মূর্তিটি উচ্চতায়
প্রায় ৪ ফুট, দেবীর
রয়েছে ‘ত্রিনেত্র’ অর্থাৎ তিনটি চোখ, এবং দুদিকের
দাঁতের মধ্যস্থলে রয়েছে বিশাল সোনার তৈরী জিহ্বা। কথিত
আছে মা নলাটেশ্বরী জল
পান করেন ‘ঢকঢক’ শব্দ করে।গর্ভগৃহে ঢোকার
পথে গণেশ ঠাকুর বিরাজমান
এবং তাকে ঘিরে রয়েছে
আটটি সাপ।মন্দিরের উত্তর দিকে পঞ্চমুন্ডির আসন
অবস্থিত।প্রচলিত আছে, ওই পঞ্চমুন্ডির
আসনের কাছে একটি নিম
গাছ আছে যার পাতাগুলি
মিষ্টি। এই গাছটির পাশেই
মহাষষ্ঠীর পায়ের ছাপ একটি ফলকের
উপর খোদিত আছে।
এছাড়াও, নলহাটি মন্দিরটি প্রাকৃতিক সৌন্দর্যে ঘেরা, এবং মালভূমির পূর্বদিকে
এই মন্দিরের গোপন কাঠামোটি সুশোভিত
হয়েছে, যা এক অসাধারণ
পরিবেশ সৃষ্টি করেছে।
প্রাকৃতিক সৌন্দর্য ও তীর্থস্থান
নলহাটি একটি মনোরম স্থান,
যার চারপাশে পাহাড় এবং মালভূমি রয়েছে।
গভীর বনের মধ্যে, রহস্যময়
একটি বটগাছের নীচে, মা সতীর "নলা"
পড়েছিল বলে বিশ্বাস করা
হয়।
এই স্থান প্রকৃতি, ইতিহাস এবং ধর্মের এক
অনন্য মেলবন্ধন। প্রচুর তীর্থযাত্রী শান্তি এবং ভক্তির খোঁজে
এখানে আসেন। নলহাটির এই পবিত্র পরিবেশ
ভক্তদের মনকে গভীরভাবে ছুঁয়ে
যায়।
নলহাটি শুধুমাত্র মা কালিকার জন্য বিখ্যাত নয়, এই পবিত্র স্থানকে ঘিরে অনেক গল্প প্রচলিত।
ভৈরব যোগেশের মন্দিরে একটি প্রাচীন পায়ের
ছাপ, যা সম্প্রতি আবিষ্কৃত
হয়েছে, ভগবান বিষ্ণুর বলে ধারণা করা
হয়। যদিও অনেকেই একে
ঐশ্বরিক আশীর্বাদ বলে মানেন, এর
প্রকৃত সত্য কেউ জানেন
না।
এখানে একটি নিম গাছ
সম্পর্কে প্রচলিত একটি মিথ রয়েছে।
এর কাঁচা পাতা গাছ থেকে
সরাসরি খেলে মিষ্টি স্বাদ
পাওয়া যায়, কিন্তু মাটি থেকে তুললে
তা সাধারণ তেতো হয়ে যায়।
শোনা যায়, মারাঠা সরদার বর্গি নলাটেশ্বরীর মালভূমি অঞ্চলে কিছু সময় বাস
করেছিলেন। পরে সেই স্থানকে
"বর্গি ডাঙা" নামে ডাকা হয়।
লুণ্ঠনকারীদের জায়গা হিসাবে চিহ্নিত বর্গীডাঙ্গা ।
মন্দির প্রতিষ্ঠার পর, সন্ন্যাসী কুশলানন্দ প্রথম ভোগ প্রদান করেন এবং পঞ্চমুণ্ড আসনে সাধনা করেন। এটি এই স্থানের পবিত্রতাকে প্রমাণ করে, যা প্রকৃতির সাথে সুন্দরভাবে মিলিত।