Ma Nandikeswari (Saithia)

   Ma Nandikeswari (Saithia)

 जब सती का मृत शरीर लेकर शिव अपने संहार रूप में विश्व को आतंकित करने लगे, तब स्वर्ग के देवता त्रिलोक के विनाश के भय से शिव के रुद्ररूप को शांत करने के लिए विष्णु का स्मरण करते हैं। विष्णु उस संकट की घड़ी में व्याकुल शिव को शांत करते हैं और त्रिभुवन की रक्षा के लिए सती को sudarshan चक्र द्वारा विभाजित करते हैं। सती का शरीर इक्यावन हिस्सों में विभाजित होकर इस मृत्युलोक में गिरता है। प्रत्येक स्थल मातृ पूजा के स्थान के रूप में माना जाता है और शास्त्र, पुराण तथा लोककथाओं में महापीठ या शक्तिपीठ के नाम से प्रसिद्ध है। याज्ञिक भूमि बीरभूम के सैंथिया एक ऐसा ही पवित्र स्थल है, जहाँ सतीदेह का "कंठहार" गिरा था।

सैंथिया नगर साहेबगंज लूप लाइन पर कोलकाता से 189 किलोमीटर दूर स्थित है। बीरभूम की प्रमुख नदियों में से एक मयूराक्षी सैंथिया से होकर बहती है। प्राचीनकाल में मयूराक्षी नदी में व्यापारियों के व्यापार के कारण इस नदी के तट पर विभिन्न देवपूजा स्थलों का प्रसार था।

मयूराक्षी के तटवर्ती सभ्यता से ज्ञात होता है कि इस नदी के किनारे बीरभूम के देव-देवियों की पूजा और धार्मिक अनुष्ठानों की परंपरा थी। भांडीरबन, बीरसिंहपुर, कोटासुर, मौरेश्वर आदि ग्राम इस नदी के तटवर्ती क्षेत्र में विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। एक समय ये ग्राम शैव और शक्ति साधना के क्षेत्र के रूप में प्रसिद्ध थे। मयूराक्षी के तटवर्ती सैंथिया नगर का देवीस्‍थान शास्त्र में "नंदीपुर" नाम से जाना जाता है।

यह देवीस्‍थान सैंथिया रेलवे स्टेशन के पास ही स्थित है। 51 सतीपीठों (Sati Pith) में से एक पीठ है यह नंदीकेश्वरी मंदिर। पौराणिक मान्यता के अनुसार यहाँ माँ का कंठहार गिरा था।

एक अन्य ग्रंथ "शिवचारी" में नंदीपुर को उपपीठ के रूप में वर्णित किया गया है। उस ग्रंथ में लिखा गया है कि इस स्थल पर देवी की माला गिरी थी और पीठ की आराध्य देवी को "नंदिनी" कहा गया है, और पीठ के भैरव को "नंदीश्वर" नाम से अभिहित किया गया है। हालांकि, स्थानीय रूप से देवी नंदिनी को "देवी नंदीकेश्वरी" के नाम से जाना जाता है और इसी नाम से वे प्रसिद्ध हैं। जनश्रुति है कि देवी नंदिनी का यह मंदिर क्षेत्र एक समय शांत, निर्जन और वन क्षेत्र था। मंदिर के चारों ओर सैंथिया नगर का विस्तार हुआ, घनी बस्ती और जनसमागम बढ़ा। परंतु इन सबके बीच भी, देवी के मंदिर परिसर का शांत और पवित्र वातावरण भक्तों को एक आध्यात्मिक अनुभूति से अनुप्राणित करता है।

वटवृक्ष के नीचे स्थित यह मंदिर हाल ही में निर्मित एक सामान्य स्थापत्यशैली में निर्मित किया गया है। मंदिर के भीतर ऊँचे वेदी पर देवी को पत्थर की मूर्ति में स्थापित किया गया है। धूप और सिंदूर से सज्जित इस देवी की पूजा महाशक्ति दुर्गा की ध्यानमूर्ति के रूप में की जाती है। यहाँ वटवृक्ष और अश्वत्थ वृक्ष एक साथ बढ़ते हैं। मंदिर के चारों ओर छायादार अनेक बरगद के शाखा-प्रशाखाएं परिसर को घेरे हुए हैं। सुना जाता है कि देवी ने स्वयं स्वप्न में आकर अपने स्थान की जानकारी दी थी एक दाताराम घोष को। दाताराम दक्षिणेश्वर के निवासी थे। भाग्य की तलाश में बीरभूम आकर एक साहेब की कृपा से उन्होंने आशीर्वाद प्राप्त किया। बाद में दीवान से महाल खरीदकर वे जमींदार बने। इसके बाद से देवी नंदीकेश्वरी की पूजा का प्रचलन प्रारंभ हुआ।

माँ नंदीकेश्वरी के मंदिर से जुड़ी जनश्रुतियों में सबसे प्रमुख है साधक बामाख्यापा के सिद्धिलाभ की कथा। कथा के अनुसार, साधक बामाख्यापा जब तारापीठ में माँ तारा के दर्शन हेतु तपस्या में लीन थे, तब वे अत्यंत आकुलता से माँ को पुकार रहे थे। ठीक उसी समय, स्वप्न में माँ नंदीकेश्वरी उन्हें दर्शन देती हैं।

माँ नंदीकेश्वरी स्वप्न में बामाख्यापा को आदेश देती हैं, "पहले मेरी पूजा करो, फिर तुम्हारी साधना सिद्ध होगी।" इस स्वप्नादेश को पाकर बामाख्यापा सैंथिया आकर माँ नंदीकेश्वरी के चरणों में पूजा अर्पित करते हैं। माँ की कृपा से वे सिद्धि प्राप्त करते हैं और एक दिव्य अवस्था को प्राप्त करते हैं।

यह कथा केवल बामाख्यापा के जीवन से जुड़ी नहीं है, यह माँ नंदीकेश्वरी के मंदिर के आध्यात्मिक महत्त्व और भक्तों पर माँ की कृपा प्रदर्शित करने का एक उज्ज्वल उदाहरण है। आज भी भक्त इस कथा के माध्यम से माँ के प्रति अपनी आस्था और भक्ति प्रकट करते हैं।

पूर्व दिशा में तीन मंदिर स्थित हैं। कालियादमन मंदिर - जहाँ बालक कृष्ण की मूर्ति स्थापित है। मंदिर के सामने एक विशाल नटमंदिर है। मंदिर और नटमंदिर दोनों का पूर्ण रूप से पुनर्निर्माण किया गया है। अन्य दो मंदिरों में एक है जलाराम बाबा मंदिर। यह भाटिया-गुजराती समुदाय के गुरु का मंदिर है। पास में ही एक और मंदिर है हनुमान मंदिर, जिसका भी नव-संस्कार किया गया है। मंदिर के भीतर बजरंगबली मूर्ति की पूजा होती है।

नंदीकेश्वरी मंदिर के प्रवेशद्वार के दाहिनी ओर एक जगन्नाथ मंदिर स्थित है। मंदिर के भीतर जगन्नाथ, बलराम और सुभद्रा की मूर्तियाँ स्थापित हैं। मंदिर परिसर के प्रवेशद्वार के बायीं ओर देवी षष्ठी का स्थान पुनर्निर्मित किया गया है। यहाँ कुछ शिलाखंड देवी षष्ठी रूप में पूजित होते हैं। मन्नत पूर्ण करने के लिए मिट्टी से बने घोड़े चढ़ाने की प्रथा है।

मंदिर से सटे एक विशाल आँगन एक दीवार से घिरा हुआ है। आँगन में प्रवेशद्वार के दाहिनी ओर एक एकमंज़िला भवन में पीठभैरव 'नंदीकेश्वर' का स्थान है। मंदिर पुनर्निर्माण समिति मंदिर के पुनर्निर्माण और अन्य विकास कार्यों से जुड़ी हुई है। गत दशक में इस सतीपीठ में दो प्रमुख कार्यों में एक है मोहनानंद ब्रह्मचारी महाराज द्वारा संचालित 'बालानंद तीर्थ आश्रम'। दूसरा है तीर्थयात्रियों के लिए 'तीर्थवास', जिसमें स्थानीय लोगों के लिए विभिन्न सामाजिक कार्यक्रमों के आयोजन की सुविधा है।

इसी अस्सी के दशक में मंदिर परिसर में रथयात्रा उत्सव प्रारंभ हुआ। पुरी से जगन्नाथ, सुभद्रा, बलराम की दारुमूर्ति लाई गई। उन मूर्तियों का अभिषेक कर नंदीकेश्वरी मंदिर के प्रवेशद्वार के पास ही स्थापना की गई। निर्मित हुआ एक विशालकाय रथ और जगन्नाथदेव का मंदिर भी।

इस सतीपीठ में सबसे प्रमुख पूजाएँ हैं दुर्गा पूजा, काली पूजा और विपत्तारिणी पूजा। सैंथिया और आसपास के विभिन्न गाँवों से भक्त यहाँ एकत्रित होते हैं। इसके अतिरिक्त, प्रत्येक मंगलवार और शनिवार को देवी पूजा के लिए कई भक्त यहाँ आते हैं।                                                 



Ma Nandikeswari (Saithia)

সাঁইথিয়া শহর সাহেবগঞ্জ লুপ লাইনের ওপর কলকাতা থেকে ১৮৯ কিলোমিটার দূরে অবস্থিত। বীরভূমের প্রধান নদীগুলির মধ্যে অন্যতম ময়ূরাক্ষী সাঁইথিয়া দিয়ে প্রবাহিত হয়। প্রাচীনকালে ময়ূরাক্ষী নদীতে ব্যবসায়ীদের ব্যবসার কারণে এই নদীর তীরে বিভিন্ন দেবপূজার স্থান ছড়িয়ে ছিল।

ময়ূরাক্ষীর তীরবর্তী সভ্যতা থেকে জানা যায় যে, এই নদীর তীরে বীরভূমের দেব-দেবীদের পূজা আচার-অনুষ্ঠানের প্রচলন ছিল। ভাণ্ডীরবন, বীরসিংহপুর, কোটাসুর, মৌরেশ্বর প্রভৃতি গ্রাম এই নদীর তীরবর্তী অঞ্চলে বিশেষ উল্লেখযোগ্য। এক সময় এই গ্রামগুলি শৈব এবং শক্তি সাধনার ক্ষেত্র হিসেবে পরিচিত ছিল। ময়ূরাক্ষীর তীরবর্তী সাঁইথিয়া শহরের দেবীস্থান শাস্ত্রে "নন্দীপুর" নামে পরিচিত।

এই দেবীস্থান সাঁইথিয়া রেলওয়ে স্টেশনের কাছেই অবস্থিত। ৫১ সতপীঠের (Sati Pith) অন্যতম এক পীঠ হল এই নন্দীকেশ্বরী মন্দির । পৌরাণিক মতে এখানে মায়ের কণ্ঠহার পড়েছিল।

অন্য একটি গ্রন্থ "শিবচারী"-তে নন্দীপুরকে উপপীঠ হিসেবে বর্ণনা করা হয়েছে। ওই গ্রন্থে লেখা হয়েছে যে, এই স্থানে দেবীর মালা পড়েছিল এবং পীঠের আরাধ্য দেবীকে "নন্দিনী" বলা হয়, এবং পীঠের ভৈরবকে "নন্দীশ্বর" নামে অভিহিত করা হয়। তবে, স্থানীয়ভাবে দেবী নন্দিনীকে "দেবী নন্দীকেশ্বরী" নামে অভিহিত করা হয় এবং নামেই তিনি প্রসিদ্ধ। জনশ্রুতি রয়েছে যে, দেবী নন্দিনীর এই মন্দির সংলগ্ন এলাকা একসময় শান্ত, নির্জন এবং বনাঞ্চল ছিল। মন্দিরের চারপাশে সাঁইথিয়া শহরের প্রসার ঘটেছে, ঘনবসতি এবং জনসমাগম বেড়েছে। তবে এই সমস্ত কিছুর মাঝেও, দেবীর মন্দির প্রাঙ্গণের শান্ত পবিত্র পরিবেশ ভক্তদের এক আধ্যাত্মিক অনুভূতিতে অনুপ্রাণিত করে।

বটগাছের নিচে অবস্থিত এই মন্দিরটি সম্প্রতি নির্মিত একটি সাধারণ স্থাপত্যশৈলীতে গড়ে তোলা হয়েছে। মন্দিরের ভিতরে উঁচু বেদিতে দেবীকে পাথরের মূর্তিতে প্রতিষ্ঠিত করা হয়েছে। ধূপ সিঁদুর দিয়ে সজ্জিত এই দেবীকে মহাশক্তি দুর্গার ধ্যানমূর্তিতে পূজা করা হয়। এখানে বটগাছ এবং অশ্বত্থ গাছ একত্রে বেড়ে ওঠে। মন্দিরের চারপাশে ছায়াদানকারী অসংখ্য বরগাছের শাখাপ্রশাখা প্রাঙ্গণকে পরিবেষ্টন করে। শোনা যায়, দেবী নিজেই স্বপ্নে এসে তাঁর অবস্থানের কথা জানিয়েছিলেন জনৈক দাতারাম ঘোষকে। দাতারাম ছিলেন দক্ষিণেশ্বরের অধিবাসী। ভাগ্য অন্বেষণে বীরভূমে এসে এক সাহেবের কৃপায় তিনি আর্শীবাদ লাভ করেছিলেন। পরে দেওয়ান থেকে মহাল কিনে জমিদার হয়ে ওঠেন। এর পর থেকেই দেবী নন্দিকেশ্বরীর পূজার প্রচলন শুরু হয়।

 

মা নন্দীকেশ্বরীর মন্দিরকে ঘিরে প্রচলিত জনশ্রুতিগুলির মধ্যে অন্যতম হলো সাধক বামাখ্যাপার সিদ্ধিলাভের গল্প। কাহিনী অনুযায়ী, সাধক বামাখ্যাপা যখন তারাপীঠে মা তারার দর্শন লাভের উদ্দেশ্যে তপস্যায় রত ছিলেন, তখন তিনি অত্যন্ত আকুলতায় মাকে ডাকছিলেন। ঠিক সেই সময়, স্বপ্নে মা নন্দীকেশ্বরী তাঁকে দর্শন দেন।

মা নন্দীকেশ্বরী স্বপ্নে বামাখ্যাপাকে নির্দেশ দেন, "আগে আমার পূজা করো, তারপর তোমার সাধনা সিদ্ধ হবে।" এই স্বপ্নাদেশ পেয়ে বামাখ্যাপা সাঁইথিয়ায় এসে মা নন্দীকেশ্বরীর চরণে পূজা অর্পণ করেন। মায়ের কৃপায় তিনি সিদ্ধিলাভ করেন এবং এক ঐশ্বরিক অবস্থায় পৌঁছান।

এই কাহিনী শুধু বামাখ্যাপার জীবনের সঙ্গে যুক্ত নয়, এটি মা নন্দীকেশ্বরীর মন্দিরের আধ্যাত্মিক মাহাত্ম্য এবং ভক্তদের প্রতি মায়ের কৃপা প্রদর্শনের একটি উজ্জ্বল উদাহরণ। আজও ভক্তরা এই কাহিনীর মাধ্যমে মায়ের প্রতি তাঁদের আস্থা ভক্তি প্রকাশ করেন।

পূর্বদিকে তিনটি মন্দির রয়েছে। কালিয়াদমন মন্দির - যেখানে বালক কৃষ্ণের মূর্তি স্থাপিত। মন্দিরের সামনে একটি বিশাল নটমন্দির রয়েছে। মন্দির নটমন্দিরটি সম্পূর্ণরূপে পুনর্নির্মিত হয়েছে। অন্য দুটি মন্দিরের মধ্যে একটি হল জলারাম বাবা মন্দির। এটি ভাটিয়া-গুজরাটি সম্প্রদায়ের গুরু মন্দির। পাশে অন্য একটি মন্দির হানুমান মন্দির, যারও নব-সংস্কার করা হয়েছে। মন্দিরের ভিতরে বজরংবলী মূর্তির পূজা হয়।

নন্দিকেশ্বরী মন্দিরের প্রবেশদ্বারের ডান দিকে একটি জগন্নাথ মন্দির রয়েছে। মন্দিরের ভিতরে জগন্নাথ, বলরাম এবং সুবদ্রার মূর্তি স্থাপিত রয়েছে। মন্দিরমন্ডলের প্রবেশদ্বারের বাঁ দিকে দেবী ষষ্ঠী স্থানটি পুনর্নির্মিত হয়েছে। এখানে কিছু শিলাখণ্ড দেবী ষষ্ঠী রূপে পূজিত হয়। মন্নত পূর্ণ করার জন্য মাটি দিয়ে তৈরি ঘোড়া চড়ানোর প্রথা রয়েছে।

মন্দিরের সাথে সংলগ্ন একটি বিশাল আঙ্গিনা একটি দেওয়াল দ্বারা ঘেরা। আঙিনায় প্রবেশদ্বারের ডানদিকে একটি একতলা ভবনে পীঠভৈরব 'নন্দিকেশর' এর স্থান রয়েছে। মন্দির পুনর্নির্মাণ কমিটি মন্দির পুনর্নির্মাণ এবং অন্যান্য উন্নয়নমূলক কাজের সাথে যুক্ত রয়েছে। গত দশকে এই সতীপীঠে দুটি উল্লেখযোগ্য কাজের মধ্যে একটি হল মোহনানন্দ ব্রহ্মচারী মহারাজ দ্বারা পরিচালিত 'বালানন্দ তীর্থ আশ্রম' দ্বিতীয়টি তীর্থযাত্রীদের জন্য 'তীর্থবাস', যাতে স্থানীয়দের জন্য বিভিন্ন সামাজিক কার্যক্রমের আয়োজনের সুবিধা রয়েছে।

এই আটের দশকেই মন্দির প্রাঙ্গণে শুরু হয় রথযাত্রা উৎসব। পুরী থেকে জগন্নাথ, সুভদ্রা, বলরামের দারুমূর্তি আনা হয়। সেই মূর্তি অভিষেক পর্বের মাধ্যমে নন্দিকেশ্বরী মন্দিরের প্রবেশপথের পাশেই প্রতিষ্ঠা করা হয়। তৈরি করা হয় বিশালাকৃতি রথ এবং জগন্নাথদেবের মন্দিরও।

এই সতীপীঠে সবচেয়ে গুরুত্বপূর্ণ পূজাগুলি হল দুর্গা পূজা, কালী পূজা এবং বিপত্তারিণী পূজা। সাঁইথিয়া আশেপাশের বিভিন্ন গ্রাম থেকে ভক্তরা এখানে সমবেত হন। এছাড়াও, প্রতি মঙ্গলবার এবং শনিবার দেবী পূজার জন্য অনেক ভক্ত এখানে আসে।


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